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लल्लनगुरु BIG BREAKING:मरवाही में आदिवासी किसानों की पुश्तैनी जमीन पर बड़ा खेल? फर्जी नामांतरण कर 19 एकड़ 22 डिसमिल भूमि दूसरे के नाम दर्ज करने का आरोप! प्रशासनिक मिलीभगत के आरोप से मचा हड़कंप

फर्जी वारिस बनाकर किया नामांतरण?

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के मरवाही तहसील से आदिवासी किसानों की जमीन से जुड़े एक गंभीर कथित फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। वर्षों से जिस पुश्तैनी जमीन पर आदिवासी किसान खेती-किसानी कर अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे थे, अब उसी जमीन को कथित रूप से फर्जी नामांतरण और कागजी खेल के जरिए दूसरे लोगों के नाम दर्ज कर बेच देने का आरोप लगाया गया है।

पीड़ित किसानों ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर शिकायत सौंपते हुए पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। शिकायत में बताया गया है कि लगभग 19 एकड़ 22 डिसमिल भूमि उनके पूर्वजों के नाम पर दर्ज थी और वे पीढ़ियों से उस जमीन पर काबिज हैं। लेकिन अचानक उन्हें जानकारी मिली कि उनकी जमीन का नामांतरण कर दूसरे लोगों को भू-स्वामी बना दिया गया है।

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सबसे गंभीर आरोप यह है कि यह पूरा खेल कथित रूप से ग्राम पंचायत के प्रस्ताव और फर्जी वारिस तैयार कर किया गया। किसानों का कहना है कि न तो उन्हें किसी प्रकार की सूचना दी गई, न कोई नोटिस मिला और न ही उनकी सहमति ली गई। इसके बावजूद तहसील कार्यालय मरवाही से आदेश जारी कर जमीन का रिकॉर्ड बदल दिया गया।

पीड़ितों का आरोप है कि बाद में उसी जमीन का विक्रय पत्र भी तैयार कर दिया गया, जिससे यह मामला केवल नामांतरण तक सीमित नहीं बल्कि संगठित भूमि घोटाले की आशंका पैदा करता है। किसानों ने प्रशासन पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि आखिर बिना वास्तविक वारिसों की जानकारी और सुनवाई के इतनी बड़ी जमीन का रिकॉर्ड कैसे बदल दिया गया?

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ग्रामीणों में इस मामले को लेकर भारी आक्रोश देखा जा रहा है। आदिवासी किसानों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो उनकी पुश्तैनी जमीन पूरी तरह हाथ से निकल जाएगी। उन्होंने दोषियों पर एफआईआर दर्ज करने, नामांतरण निरस्त करने और जमीन पुनः उनके नाम दर्ज कराने की मांग की है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इस कथित फर्जीवाड़े की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करेगा या फिर आदिवासी किसानों की जमीन का मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा? मरवाही में उठे इस विवाद ने एक बार फिर जमीन रिकॉर्ड और नामांतरण प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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